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Sunday, March 5, 2017

बंधे हाथियों

एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं!!! ये स्पष्ठ था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे.

उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं ? तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”

आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं!!

इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनायीं हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं.

याद रखिये असफलता जीवन का एक हिस्सा है ,और निरंतर प्रयास करने से ही सफलता मिलती है. यदि आप भी ऐसे किसी बंधन में बंधें हैं जो आपको अपने सपने सच करने से रोक रहा है तो उसे तोड़ डालिए….. आप हाथी नहीं इंसान हैं.

Tuesday, November 15, 2016

कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..

एक राजा का दरबार लगा हुआ था,
क्योंकि सर्दी का दिन था इसलिये
राजा का दरवार खुले मे लगा हुआ था.
पूरी आम सभा सुबह की धूप मे बैठी थी ..
महाराज के सिंहासन के सामने...
एक शाही मेज थी...
और उस पर कुछ कीमती चीजें रखी थीं.
पंडित लोग, मंत्री और दीवान आदि
सभी दरबार मे बैठे थे
और राजा के परिवार के सदस्य भी बैठे थे.. ..

उसी समय एक व्यक्ति आया और प्रवेश माँगा..
प्रवेश मिल गया तो उसने कहा
“मेरे पास दो वस्तुएं हैं,
मै हर राज्य के राजा के पास जाता हूँ और
अपनी वस्तुओं को रखता हूँ पर कोई परख नही पाता सब हार जाते है
और मै विजेता बनकर घूम रहा हूँ”..
अब आपके नगर मे आया हूँ

राजा ने बुलाया और कहा “क्या वस्तु है”
तो उसने दोनो वस्तुएं....
उस कीमती मेज पर रख दीं..

वे दोनों वस्तुएं बिल्कुल समान
आकार, समान रुप रंग, समान
प्रकाश सब कुछ नख-शिख समान था.. … ..

राजा ने कहा ये दोनो वस्तुएं तो एक हैं.
तो उस व्यक्ति ने कहा हाँ दिखाई तो
एक सी ही देती है लेकिन हैं भिन्न.

इनमें से एक है बहुत कीमती हीरा
और एक है काँच का टुकडा।

लेकिन रूप रंग सब एक है.
कोई आज तक परख नही पाया क़ि
कौन सा हीरा है और कौन सा काँच का टुकड़ा..

कोइ परख कर बताये की....
ये हीरा है और ये काँच..
अगर परख खरी निकली...
तो मैं हार जाऊंगा और..
यह कीमती हीरा मै आपके राज्य की तिजोरी मे जमा करवा दूंगा.

पर शर्त यह है क़ि यदि कोई नहीं
पहचान पाया तो इस हीरे की जो
कीमत है उतनी धनराशि आपको
मुझे देनी होगी..

इसी प्रकार से मैं कई राज्यों से...
जीतता आया हूँ..

राजा ने कहा मै तो नही परख सकूगा..
दीवान बोले हम भी हिम्मत नही कर सकते
क्योंकि दोनो बिल्कुल समान है..
सब हारे कोई हिम्मत नही जुटा पा रहा था.. ..

हारने पर पैसे देने पडेगे...
इसका कोई सवाल नही था,
क्योंकि राजा के पास बहुत धन था,
पर राजा की प्रतिष्ठा गिर जायेगी,
इसका सबको भय था..

कोई व्यक्ति पहचान नही पाया.. ..
आखिरकार पीछे थोडी हलचल हुई
एक अंधा आदमी हाथ मे लाठी लेकर उठा..
उसने कहा मुझे महाराज के पास ले चलो...
मैने सब बाते सुनी है...
और यह भी सुना है कि....
कोई परख नही पा रहा है...
एक अवसर मुझे भी दो.. ..

एक आदमी के सहारे....
वह राजा के पास पहुंचा..
उसने राजा से प्रार्थना की...
मै तो जनम से अंधा हू....
फिर भी मुझे एक अवसर दिया जाये..
जिससे मै भी एक बार अपनी बुद्धि को परखूँ..
और हो सकता है कि सफल भी हो जाऊं..

और यदि सफल न भी हुआ...
तो वैसे भी आप तो हारे ही है..

राजा को लगा कि.....
इसे अवसर देने मे क्या हर्ज है...
राजा ने कहा क़ि ठीक है..
तो तब उस अंधे आदमी को...
दोनो चीजे छुआ दी गयी..

और पूछा गया.....
इसमे कौन सा हीरा है....
और कौन सा काँच….?? ..
यही तुम्हें परखना है.. ..

कथा कहती है कि....
उस आदमी ने एक क्षण मे कह दिया कि यह हीरा है और यह काँच.. ..

जो आदमी इतने राज्यो को जीतकर आया था
वह नतमस्तक हो गया..
और बोला....
“सही है आपने पहचान लिया.. धन्य हो आप…
अपने वचन के मुताबिक.....
यह हीरा.....
मै आपके राज्य की तिजोरी मे दे रहा हूँ ” ..

सब बहुत खुश हो गये
और जो आदमी आया था वह भी
बहुत प्रसन्न हुआ कि कम से कम
कोई तो मिला परखने वाला..

उस आदमी, राजा और अन्य सभी
लोगो ने उस अंधे व्यक्ति से एक ही
जिज्ञासा जताई कि तुमने यह कैसे
पहचाना कि यह हीरा है और वह काँच.. ..

उस अंधे ने कहा की सीधी सी बात है मालिक
धूप मे हम सब बैठे है.. मैने दोनो को छुआ ..
जो ठंडा रहा वह हीरा.....
जो गरम हो गया वह काँच.....

जीवन मे भी देखना.....

जो बात बात मे गरम हो जाये, उलझ जाये...
वह व्यक्ति "काँच" हैं

और

जो विपरीत परिस्थिति मे भी ठंडा रहे.....
वह व्यक्ति "हीरा" है..!!...✍

--
जिसने भी लिखा, संदेश अनुकरणीय है। इसे जीवन में अपनाएं।

*मैसेज अच्छा है पड़ना जरूर*

छोटा सा जीवन है, लगभग 80 वर्ष।  उसमें से आधा =40 वर्ष तो रात को बीत जाता है। 

उसका आधा=20 वर्ष बचपन और बुढ़ापे मे बीत जाता है। 

बचा 20 वर्ष। उसमें भी कभी योग, कभी वियोग, कभी पढ़ाई,कभी परीक्षा, नौकरी, व्यापार और अनेक चिन्ताएँ व्यक्ति को घेरे रखती हैँ।

अब बचा ही कितना ? 8/10 वर्ष। 

उसमें भी हम शान्ति से नहीं जी सकते ? यदि हम थोड़ी सी सम्पत्ति के लिए झगड़ा करें, और फिर भी सारी सम्पत्ति यहीं छोड़ जाएँ,

तो इतना मूल्यवान मनुष्य जीवन प्राप्त करने का क्या लाभ हुआ? स्वयं विचार कीजिये :- 


इतना कुछ होते हुए भी,

1- शब्दकोश में असंख्य शब्द होते हुए भी...           👍मौन होना सब से बेहतर है।

2- दुनिया में हजारों रंग होते हुए भी...                    👍सफेद रंग सब से बेहतर है।

3- खाने के लिए दुनिया भर की चीजें होते हुए भी...   👍उपवास शरीर के लिए सबसे बेहतर है।

4- देखने के लिए इतना कुछ होते हुए भी...              👍बंद आँखों से भीतर देखना सबसे बेहतर है।

5- सलाह देने वाले लोगों के होते हुए भी...                👍अपनी आत्मा की आवाज सुनना सबसे बेहतर है।

6- जीवन में हजारों प्रलोभन होते हुए भी...                👍सिद्धांतों पर जीना सबसे बेहतर है।





इंसान के अंदर जो समा जायें वो
             " स्वाभिमान "
                    और
जो इंसान के बाहर छलक जायें वो

             " अभिमान "
ये मैसेज पूरा पढ़े, और
   अच्छा लगे तो सबको भेजें 



🔹जब भी बड़ो के साथ बैठो तो   परमेश्वर का धन्यवाद करो ,  क्योंकि कुछ लोग  इन लम्हों को तरसते हैं ।

🔹जब भी अपने काम पर जाओ तो परमेश्वर का धन्यवाद करो क्योंकि बहुत से लोग बेरोजगार हैं ।

🔹 परमेश्वर का धन्यवाद कहो जब तुम तन्दुरुस्त हो ,     क्योंकि बीमार किसी भी कीमत पर सेहत खरीदने की ख्वाहिश रखते हैं ।

🔹 परमेश्वर का धन्यवाद कहो  की तुम जिन्दा हो ,           क्योंकि मरते हुए लोगों से पूछो    जिंदगी की कीमत क्या है।

दोस्तों की ख़ुशी के लिए तो कई मैसेज भेजते हैं ।
देखते हैं 
परमेश्वर के धन्यवाद का ये मैसेज कितने लोग शेयर करते हैं !

छुरी use of knife

कुनै शलक्रिया विशेषज्ञ , चिकित्सकले छुरी चलौ छ मानिस देहमा रोग व्यधि बाट रक्षा गर्नुको निमित c , कैची चलाई चिरफाड़ गर्छ र अर्को तीर चोर डाकाले लूटन , स्वहरण गर्नको निम्ति छुरा धारिलो हतियार चलाउछ। चिकित्सकले चलाएको छुरीको तात्पर्य सकारत्मक हो र डाकाले चलाएको छुरीको तात्पर्य नकारत्मक हो । त्यसैले केहि ग्रहण गर्नु पूर्व यसरी नै सकारत्मक र नकारत्मक छुट्याएर लिनु होला

Saturday, October 29, 2016

बाऱ- बार दुख और संकट आने पर भी जो इंसान अपना रंग नहीं बदलता,समाज में उसका ही मूल्य बढ़ता है

*दूध को दुखी करो तो दही बनता है|*
*दही को सताने से मक्खन बनता है|*
*मक्खन को सताने से घी बनता है|*
*दूध से महंगा दही है,दही से महंगा मक्खन है,और मक्खन से महंगा घी है|*
*किन्तु इन चारों का रंग एक ही है सफेद|*

*इसका अर्थ है बाऱ- बार दुख और संकट आने पर भी जो इंसान अपना रंग नहीं बदलता,समाज में उसका ही मूल्य बढ़ता है|*

*दूध* उपयोगी है किंतु एक ही दिन के लिए, फिर वो *खराब* हो जाता है....!!
*दूध* में एक बूंद *छाछ* डालने से वह *दही* बन जाता है जो केवल दो और दिन *टिकता* है....!!
*दही* का मंथन करने पर *मक्खन* बन जाती है, यह और तीन दिन टिकता है....!!
*मक्खन* को उबालकर *घी* बनता है, *घी* कभी खराब नहीं होता....!!
एक ही दिन में बिगड़ने वाले *दूध* में कभी नहीं बिगड़ने वाला *घी* छिपा है....!!
इसी तरह आपका मनको  भी सकारात्मक विचारो से  अपने मनको  मथो 

अर्थात चिंतन  करो. अपने *जीवन* को और *तपाओ* 

और तब देखना कि आपका जीवन बदल जयेगा 

Monday, September 26, 2016

एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड होना

महाकवि कालिदास के कंठ में साक्षात सरस्वती का वास था । शास्त्रार्थ में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता था । अपार यश, प्रतिष्ठा और सम्मान पाकर एक बार कालिदास को अपनी विद्वत्ता का घमंड हो गया ।
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उन्हें लगा कि उन्होंने विश्व का सारा ज्ञान प्राप्त कर लिया है और अब सीखने को कुछ बाकी नहीं बचा उनसे बड़ा ज्ञानी संसार में कोई दूसरा नही । एक बार पड़ोसी राज्य से शास्त्रार्थ का निमंत्रण पाकर कालिदास विक्रमादित्य से अनुमति लेकर अपने घोड़े पर रवाना हुए ।
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गर्मी का मौसम था । धूप काफी तेज़ और लगातार यात्रा से कालिदास को प्यास लग आई । थोङी तलाश करने पर उन्हें एक टूटी झोपड़ी दिखाई दी । पानी की आशा में वह उस ओर बढ चले । झोपड़ी के सामने एक कुआं भी था ।
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कालिदास ने सोचा कि कोई झोपड़ी में हो तो उससे पानी देने का अनुरोध किया जाए । उसी समय झोपड़ी से एक छोटी बच्ची मटका लेकर निकली । बच्ची ने कुएं से पानी भरा और वहां से जाने लगी ।
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कालिदास उसके पास जाकर बोले- बालिके ! बहुत प्यास लगी है ज़रा पानी पिला दे । बच्ची ने पूछा- आप कौन हैं ? मैं आपको जानती भी नहीं, पहले अपना परिचय दीजिए । कालिदास को लगा कि मुझे कौन नहीं जानता भला, मुझे परिचय देने की क्या आवश्यकता ?
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फिर भी प्यास से बेहाल थे तो बोले- बालिके अभी तुम छोटी हो । इसलिए मुझे नहीं जानती । घर में कोई बड़ा हो तो उसको भेजो । वह मुझे देखते ही पहचान लेगा । मेरा बहुत नाम और सम्मान है दूर-दूर तक । मैं बहुत विद्वान व्यक्ति हूं ।
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कालिदास के बड़बोलेपन और घमंड भरे वचनों से अप्रभावित बालिका बोली-आप असत्य कह रहे हैं । संसार में सिर्फ दो ही बलवान हैं और उन दोनों को मैं जानती हूं । अपनी प्यास बुझाना चाहते हैं तो उन दोनों का नाम बाताएं ?
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थोडा सोचकर कालिदास बोले-मुझे नहीं पता, तुम ही बता दो मगर मुझे पानी पिला दो । मेरा गला सूख रहा है. बालिका बोली-दो बलवान हैं

अन्न’ और ‘जल’ भूख और प्यास में इतनी शक्ति है कि बड़े से बड़े बलवान को भी झुका दें । देखिए प्यास ने आपकी क्या हालत बना दी है ।
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कलिदास चकित रह गए । लड़की का तर्क अकाट्य था । बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर चुके कालिदास एक बच्ची के सामने निरुत्तर खङे थे । बालिका ने पुनः पूछा-सत्य बताएं, कौन हैं आप ? वह चलने की तैयारी में थी ।
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कालिदास थोड़ा नम्र होकर बोले-बालिके ! मैं बटोही हूं । मुस्कुराते हुए बच्ची बोली-आप अभी भी झूठ बोल रहे हैं. संसार में दो ही बटोही हैं. उन दोनों को मैं जानती हूं, बताइए वे दोनों कौन हैं ?
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तेज़ प्यास ने पहले ही कालिदास की बुद्धि क्षीण कर दी थी पर लाचार होकर उन्होंने फिर से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी ।
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बच्ची बोली-आप स्वयं को बङा विद्वान बता रहे हैं और ये भी नहीं जानते ? एक स्थान से दूसरे स्थान तक बिना थके जाने वाला बटोही कहलाता है । बटोही दो ही हैं, एक चंद्रमा और दूसरा सूर्य जो बिना थके चलते रहते हैं । आप तो थक गए हैं । भूख प्यास

से बेदम हैं । आप कैसे बटोही हो सकते हैं ?
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इतना कहकर बालिका ने पानी से भरा मटका उठाया और झोपड़ी के भीतर चली गई । अब तो कालिदास और भी दुखी हो गए । इतने अपमानित वे जीवन में कभी नहीं हुए । प्यास से शरीर की शक्ति घट रही थी । दिमाग़ चकरा रहा था । उन्होंने आशा से झोपड़ी की तरफ़ देखा । तभी अंदर से एक वृद्ध स्त्री निकली ।
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उसके हाथ में खाली मटका था । वह कुएं से पानी भरने लगी । अब तक काफी विनम्र हो चुके कालिदास बोले- माते पानी पिला दीजिए बडा पुण्य होगा ।
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स्त्री बोली-बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं । अपना परिचय दो । मैं अवश्य पानी पिला दूंगी । कालिदास ने कहा-मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें ।
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स्त्री बोली- तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं । पहला धन और दूसरा यौवन । इन्हें जाने में समय नहीं लगता । सत्य बताओ कौन हो तुम ?
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अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश कालिदास बोले-मैं सहनशील हूं । अब आप पानी पिला दें । स्त्री ने कहा-नहीं, सहनशील तो दो ही हैं । पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है । उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है ।
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दूसरे, पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं । तुम सहनशील नहीं । सच बताओ तुम कौन हो ? कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले- मैं हठी हूं ।
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स्त्री बोली-फिर असत्य । हठी तो दो ही हैं-पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं. सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ?
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पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके कालिदास ने कहा-फिर तो मैं मूर्ख ही हूं ।
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नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो । मूर्ख दो ही हैं । पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है ।
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कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे ।
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वृद्धा ने कहा- उठो वत्स ! आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी.
कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए ।
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माता ने कहा-शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार. तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा ।
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कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े ।